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ग़ज़ल
तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ
ऐसे पस-मंज़र में क्या रहना सर-ए-मंज़र तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
उस की आवारगी को दु'आएँ दो ऐ साहिबान-ए-जुनूँ
जिस के नक़्श-ए-क़दम ने बिछाए सर-ए-रहगुज़र आइने
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
'अदू के जौर से जो कुछ भी बीती थी सो बीती थी
मगर जो दोस्त के हाथों सर-ए-अहल-ए-वला गुज़री
एस. ए. रहमान
ग़ज़ल
हम भी कुछ देर को चमके थे कि बस राख हुए
सच तो ये है कि रम-ओ-रक़्स-ए-शरर ही कितना