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ग़ज़ल
क़ाफ़िला उतरा सहरा में और पेश वही मंज़र आए
राख उड़ी ख़ेमा-गाहों की ख़ून में लुथड़े सर आए
एजाज़ गुल
ग़ज़ल
बनाया है जिन्हें मैं ने मोहब्बत के गुलाबों से
तर-ओ-ताज़ा वो गुल-दस्ते तुम्हारे नाम करती हूँ
समीना गुल
ग़ज़ल
पहुँच चुके थे सर-ए-शाख़-ए-गुल असीर हुए
लुटा है सामने मंज़िल के कारवाँ अपना
अब्दुर्रशीद ख़ान कैफ़ी महकारी
ग़ज़ल
जिन पे बारिश-ए-गुल है उन का हाल क्या होगा
ज़ख़्म खाने वाले भी बाग़ बाग़ हैं यारो