aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "sar-e-imaam"
बुलंद बा'द-ए-शहादत भी है ये नोक-ए-सिनाँसर-ए-इमाम किसी हाल भी नहीं है निगूँ
जी भी लिया न आई मुझे मौत जब तलकये एक और काम सर-ए-दस्त हो गया
सर-ए-इहाता-ए-ग़म रात भर सँवरना थातिरी जुदाई में कार-ए-हुनर भी करना था
तिरा ख़याल सर-ए-शाम ग़म सँवरता हुआबहुत क़रीब से गुज़रा सलाम करता हुआ
कई दिन से नशेमन ख़ाक-ए-दिल कासर-ए-शाख़-ए-हवा है और मैं हूँ
ये मैं ने देखा है अक्सर फटी पुरानी हयातसर-ए-दरीचा-ए-शब हाथ मलती रहती है
एक महताब दरख़्शाँ है सर-ए-बाम-ए-ख़यालमेरी आँखों में भी नैरंग-ए-नज़र रख देना
मैं बिछाता हूँ मुसल्ला सर-ए-मेहराब-ए-नियाज़फिर इबादत मुझे पाताल में ले जाती है
आज ख़ुद हुस्न को देखा है सर-ए-कूचा-ए-इश्क़देखें आग़ाज़ कोई ताज़ा रिवायत ही न हो
हर आह-ए-सर्द इश्क़ है हर वाह इश्क़ हैहोती है जो भी जुरअत-ए-निगाह इश्क़ है
'अमीर' इमाम बताओ ये माजरा क्या हैतुम्हारे शेर उसी बाँकपन में लौट आए
ज़ख़्म बहुत मिले मगर आज भी है उठाए सरदेख जहान-ए-फ़ित्ना-गर तेरी शिकस्त 'अमीर-इमाम'
ये सारा शहर आला-ए-हिकमत लिखे उसेख़ंजर अगर है कोई तो ख़ंजर लिखेंगे हम
अमीर इमाम मुबारक हो फ़तह-ए-इश्क़ तुम्हेंये दर्द-ए-माल-ए-ग़नीमत है सब तुम्हारा हुआ
रूठा हुआ है कब से मनाने को आए हैंउठ ऐ 'अमीर-इमाम' बुलाने को आए हैं
हज़ार शुक्र ख़ुदा-ए-फ़लक-नशीं तेराये सर ज़मीं के ख़ुदाओं से ख़म नहीं होता
किस ने पहचाना यहाँ इन कोर-बीनों में मुझेकौन मेरा लाशा-ए-बे-सर उठा कर ले गया
इस धूप में साए की तमन्ना न करो तुमवो हुस्न-ए-मुजस्सम तो सर-ए-शाम मिलेगा
बुझती हुई सुब्हें हों कि जलती हुई रातेंतुझ से ये मुलाक़ात सर-ए-शाम बहुत है
जिस से कतरा के निकलते रहे बरसों सर-ए-राहउस से कल हाथ मिलाया तो वो अपना निकला
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