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ग़ज़ल
आरज़ू है बा'द-ए-मुर्दन भी रहूँ सैराब-ए-मय
सर्फ़-ए-जाम-ओ-ख़ुम करें मेरा ग़ुबार अब के बरस
हबीब मूसवी
ग़ज़ल
जब सर्फ़-ए-गुफ़्तुगू हूँ तो देखे उन्हें कोई
मंज़ूर हो जो अब्र-ए-गुहर-बार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्या पिघलता जो रग-ओ-पै में था यख़-बस्ता लहू
वक़्त के जाम में था शोला-ए-तर ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
अपना मिट्टी का पियाला हम को प्यारा है बहुत
हम न देंगे पेश अगर वो साग़र-ए-जम भी करें
शकील इबन-ए-शरफ़
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
हट जाए इक तरफ़ बुत-ए-काफ़िर की राह से
दे कोई जल्द दौड़ के महशर को इत्तिलाअ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
जान से बढ़ कर हैं प्यारे दिल से बढ़ कर हैं अज़ीज़
महफ़िल-ए-अहबाब में हम किस को बेगाना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
दिल में वही ख़लिश है वही ज़ौक़-ए-जाँ-गुदाज़
फिर चाहता हूँ लज़्ज़त-ए-पैकान-ए-आरज़ू
साक़िब रामपुरी
ग़ज़ल
वो गर्म-ए-सर्फ़-ए-नाज़ थे वाँ बज़्म-ए-ग़ैर में
सरगर्म उस तरफ़ मिरा दिल सर्फ़-ए-जाँ में था