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ग़ज़ल
मर्ग ही सेहत है उस की मर्ग ही उस का इलाज
इश्क़ का बीमार क्या जाने दवा क्या चीज़ है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
हुई हरगिज़ न तेरे चश्म के बीमार को सेह्हत
न जब तक ज़हर तेरे ख़त्त-ए-ज़ंगारी से हाथ आया
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर सेहत अच्छी है जो बीमारी ज़ियादा है
इसी ख़ातिर बुढ़ापे में हवस-कारी ज़ियादा है
ज़फ़र इक़बाल
ग़ज़ल
सेहत अच्छी न हो तो ज़ुल्फ़-ए-निस्वानी से बचना
फ़िशार-ए-ख़ूँ के हमले में नमक-दानी से बचना
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
ईद को है नाज़नीनों सेहत-ए-'नाज़िम' का जश्न
हों नई आराइशें उतरें पुरानी चूड़ियाँ
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
पी रहा है मुस्कुरा कर जाम-ए-सेहत मौत का
तेरे बीमार-ए-मोहब्बत को शिफ़ा से क्या ग़रज़
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
न सेहत की करें पर्वा न हम दौलत के तालिब हों
करें सब मुल्क पर क़ुर्बान तन मन और धन पहले