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ग़ज़ल
'नसीम' इक मो'जिज़ा है सरवर-ए-आलम का दुनिया में
अली लेटे हुए हैं और बिस्तर कुछ नहीं कहता
आफ़ताब अहमद ख़ां नसीम
ग़ज़ल
तूबा-ए-बहिश्ती है तुम्हारा क़द-ए-रा'ना
हम क्यूँकर कहें सर्व-ए-इरम कह नहीं सकते
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
दिखाऊँगा तमाशा दी अगर फ़ुर्सत ज़माने ने
मिरा हर दाग़-ए-दिल इक तुख़्म है सर्व-ए-चराग़ाँ का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ऐ फ़ाख़्ता उस सर्व-ए-सही क़द का हूँ शैदा
कू-कू की सदा मुझ को सुनाना नहीं अच्छा
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
साया-ए-सर्व-ए-चमन तुझ बिन डराता है मुझे
साँप सा पानी में ऐ सर्व-ख़िरामाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
भरी दोपहर में जो पास थी वो तिरे ख़याल की छाँव थी
कभी शाख़-ए-गुल से मिसाल दी कभी उस को सर्व-ए-सही कहा
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
न सफ़र ब-शर्त-ए-मआ'ल है न तलब ब-क़ैद-ए-सवाल है
फ़क़त एक सेरी-ए-ज़ौक़ को मैं भटक रहा हूँ कहाँ कहाँ
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
नश्शा-हा शादाब-ए-रंग ओ साज़-हा मस्त-ए-तरब
शीशा-ए-मय सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मेरी शब अब मेरी शब है मेरा बादा मेरे जाम
वो मिरा सर्व-ए-रवाँ माह-ए-तमाम आ ही गया