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ग़ज़ल
हैं शह-ए-मुल्क-ए-जुनूँ सहरा है अपना तख़्त-गाह
तन पे हर दाग़-ए-जुनूँ सिक्का है अपने नाम का
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
ग़ज़ल
काट कर दस्त-ए-दुआ को मेरे ख़ुश हो ले मगर
तू कहाँ आख़िर ये शाख़-ए-बे-समर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
उस की आवारगी को दु'आएँ दो ऐ साहिबान-ए-जुनूँ
जिस के नक़्श-ए-क़दम ने बिछाए सर-ए-रहगुज़र आइने
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ की ज़ुल्मत में ग़म के मारों का
तिरे ख़याल की ताबिंदगी ने साथ दिया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ज़िंदा हो रस्म-ए-जुनूँ किस की नवा-रेज़ी से
अब रहा कौन यहाँ शो'ला-ब-जाँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
कोई मिलता ही नहीं वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-जुनूँ
अब तो बस्ती ही अलग अपनी बसा ली जाए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
ख़ुद अहल-ए-ख़िरद छोड़ गए राह-ए-वफ़ा को
हम अहल-ए-जुनूँ साहिब-ए-किरदार रहे हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
जो भी हैं सुब्ह-ए-वतन ही के परस्तारों में हैं
किन से हम ऐ शाम-ए-ग़ुर्बत तेरा अफ़्साना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
छोड़ कर सब कुछ चला था जानिब-ए-मंज़िल जुनूँ
क्यों ख़िरद ने राह में रिश्तों के पत्थर रख दिए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
ऐ ज़ुल्फ़ फैल फैल के रुख़्सार को न ढाँक
कर नीम-रोज़ की न शह-ए-मुल्क-ए-शाम हिर्स