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ग़ज़ल
इश्क़-ए-बे-परवा भी अब कुछ ना-शकेबा हो चला
शोख़ी-ए-हुस्न-ए-करिश्मा-साज़ की बातें करो
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ये क्या कि इक जहाँ को करो वक़्फ़-ए-इज़्तिराब
ये क्या कि एक दिल को शकेबा न कर सको
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
ग़ज़ल
रह-ए-ग़म मुख़्तसर कर दी है बज़्म-ए-ना-शकेबा ने
हुए हैं मंज़िलों के फ़ासले कम देखिए क्या हो