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ग़ज़ल
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ख़ुद-ब-ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जाती है
महकी महकी है शब-ए-ग़म तिरे बालों की तरह
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
शब-ए-ग़म न पूछ कैसे तिरे मुब्तला पे गुज़री
कभी आह भर के गिरना कभी गिर के आह भरना
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी
ग़ज़ल
अल्लाह-रे शाम-ए-ग़म मिरी बे-इख़्तियारियाँ
इक दिल है पास वो भी नहीं इख़्तियार में
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
दिन ही पहाड़ है शब-ए-ग़म क्या हो क्या न हो
घबरा रहे हैं आज सर-ए-शाम ही से हम