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ग़ज़ल
इश्क़ में सर फोड़ना भी क्या कि ये बे-मेहर लोग
जू-ए-ख़ूँ को नाम दे देते हैं जू-ए-शीर का
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
तुम्हारा ग़म भी किसी तिफ़्ल-ए-शीर-ख़ार सा है
कि ऊँघ जाता हूँ मैं ख़ुद उसे सुलाते हुए
रहमान फ़ारिस
ग़ज़ल
शिव तो नहीं हम फिर भी हम ने दुनिया भर के ज़हर पिए
इतनी कड़वाहट है मुँह में कैसे मीठी बात करें
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ग़ज़ल
अगर उस की ये ख़्वाहिश हो कि जू-ए-शीर लाज़िम है
फ़क़त इक बार 'ख़ालिद' वो पुकारे मैं बनाऊँगा
ख़ालिद नदीम शानी
ग़ज़ल
जो गले तक आ के अटक गया जिसे तल्ख़-काम न पी सके
वो लहू का घूँट उतर गया तो सुना है शीर-ओ-शकर भी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
काट कर रातों के पर्बत अस्र-ए-नौ के तेशा-ज़न
जू-ए-शीर-ओ-चश्मा-ए-नूर-ए-सहर लाते रहे