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ग़ज़ल
फ़रहाद-ए-हवस-पेशा ने भी दी तो सही जान
पर शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा और ही कुछ है
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
बड़ी हैरत से अरबाब-ए-वफ़ा को देखता हूँ मैं
ख़ता को देखता हूँ और सज़ा को देखता हूँ मैं
सय्यद ज़मीर जाफ़री
ग़ज़ल
बे-मेहरी-ए-अर्बाब-ए-वतन कम तो नहीं है
हाँ देखना इस दिल की चुभन कम तो नहीं है
सय्यद शफ़क़ शाह चिश्ती
ग़ज़ल
'अबस है पेश-ए-अर्बाब-ए-सुख़न अज़्म-ए-सुख़न मुझ को
वफ़ा कहने न देगी क़िस्सा-ए-रंज-ओ-मेहन मुझ को
अब्बास अली ख़ान बेखुद
ग़ज़ल
हम ने भी छोड़ दिया मसलक-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा
वो भी अब भूल गए शेवा-ए-बेदाद-गरी