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ग़ज़ल
फ़िक्र क्या उन्हें जब तू साथ है असीरों के
ऐ ग़म-ए-असीरी तू ख़ुद शिकस्त-ए-ज़िंदाँ है
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
साइब आसमी
ग़ज़ल
शिकस्त-ए-दिल है तो क्या राह-ए-इश्क़ तर्क न कर
ये देख क्या कहीं परवर्दा-ए-ज़ियाँ कोई है
अबरार अहमद
ग़ज़ल
राज़-ए-शिकस्त-ओ-फ़त्ह में हाइल थे आदाब-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ
जीत गए तो दुनिया थी और हार गए तो साया था
मुईद रशीदी
ग़ज़ल
ग़म है शिकस्त का न ख़ुशी फ़त्ह की 'फ़लक'
मुझ को अमल से काम है सूद-ओ-ज़ियाँ से क्या
हीरा लाल फ़लक देहलवी
ग़ज़ल
शिकस्त-ए-दिल का जो एहसास अब भी ज़िंदा है
तो फिर ये होंटों पे हैं मुस्कुराहटें कैसी
मुर्तज़ा बरलास
ग़ज़ल
न होते शाद आईन-ए-गुलिस्ताँ देखने वाले
फ़साना भी अगर पढ़ लेते उनवाँ देखने वाले