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ग़ज़ल
रास आती है दम-ए-सुब्ह सीध सतरों की तुझे
रात भर ख़मदार गलियों से गुज़र करता है तू
इक़तिदार जावेद
ग़ज़ल
एक हसीं को कहते सुना वो कितना ख़ुद-सर शा'इर था
हम ने 'कमाल' को सिद्ध किया है हम ने 'कमाल' को दास किया
कमाल अहमद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
ये मैं हूँ अपनी गुमरही की सीध में खड़ी हुई
कि गर्दिश-ए-शहाब की क़तार में हो तुम सभी
फ़ातिमा मेहरू
ग़ज़ल
उमीद-ए-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है वाइ'ज़ को
ये हज़रत देखने में सीधे-साधे भोले भाले हैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तब कहीं कुछ पता चला सिद्क़-ओ-ख़ुलूस-ए-हुस्न का
जब वो निगाहें इश्क़ से बातें बना के रह गईं