हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

मजरूह सुल्तानपुरी

हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

मजरूह सुल्तानपुरी

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    फिल्म: दस्तक 1970

    हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

    उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह

    इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम

    हाथ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह

    वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास

    फिरती है कोई शय निगह-ए-यार की तरह

    सीधी है राह-ए-शौक़ पे यूँही कहीं कहीं

    ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह

    बे-तेशा-ए-नज़र चलो राह-ए-रफ़्तगाँ

    हर नक़्श-ए-पा बुलंद है दीवार की तरह

    अब जा के कुछ खुला हुनर-ए-नाख़ून-ए-जुनूँ

    ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह

    'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम

    हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

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    हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह मजरूह सुल्तानपुरी

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