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ग़ज़ल
चाक-ए-दामन को मिरे चूम के ये उस ने कहा
चाक-ए-दामन की सिलाई तो नहीं हो सकती
फ़ैज़ान जाफ़री अल-ख़्वारिज़्मी
ग़ज़ल
और तो मुझ को मिला क्या मिरी मेहनत का सिला
चंद सिक्के हैं मिरे हाथ में छालों की तरह
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था
अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना