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ग़ज़ल
वो भूले जाते हैं तर्ज़-ए-जफ़ा-ए-बे-जा को
हम अपना ज़ोर-ए-वफ़ा आज़माए जाते हैं
अब्दुल मन्नान बेदिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
नासेह जो ये नसीहत-ए-बे-जा न मैं सुनी
मा'ज़ूर रख तू मुझ को मिरा दिल बजा न था
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल
ज़ुल्म-ए-बे-जा से तो ख़ुद बाज़ नहीं आते हैं
और मुझ पर है ये ताकीद कि फ़रियाद न हो
कौकब मुरादाबादी
ग़ज़ल
अब मैं हूँ और लुत्फ़-ओ-करम के तकल्लुफ़ात
ये क्यूँ हिजाब-ए-रंजिश-ए-बे-जा बना दिया