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ग़ज़ल
ऐ ज़ुल्फ़ फैल फैल के रुख़्सार को न ढाँक
कर नीम-रोज़ की न शह-ए-मुल्क-ए-शाम हिर्स
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
किसी मंज़िल पे भी ज़ुल्म-ओ-सितम से डर नहीं सकता
कि मैं सज्दा कभी बातिल के आगे कर नहीं सकता
ओम प्रकाश लाग़र
ग़ज़ल
देखा गया न मुझ से मआनी का क़त्ल-ए-आम
चुप-चाप मैं ही लफ़्ज़ों के लश्कर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ऐ दिल वालो घर से निकलो देता दावत-ए-आम है चाँद
शहरों शहरों क़रियों क़रियों वहशत का पैग़ाम है चाँद
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ख़िर्मन-ए-होश-ओ-ख़िरद जल गए इंसानों के
उन का दावा है फ़सादों में जला कुछ भी नहीं