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ग़ज़ल
ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे
ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
अज्ञात
ग़ज़ल
क़ाबिल अजमेरी
ग़ज़ल
जो हैं मज़लूम उन को तो तड़पता छोड़ देते हैं
ये कैसा शहर है ज़ालिम को ज़िंदा छोड़ देते हैं