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ग़ज़ल
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक़ को तेरे
तड़पते हैं फ़ुग़ाँ करते हैं और करवट बदलते हैं
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक़ को तेरे
तड़पते हैं फ़ुग़ाँ करते हैं और करवट बदलते हैं