aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
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परिणाम "taab-e-dil"
ताब-ए-दिल सर्फ़-ए-जुदाई हो चुकीया'नी ताक़त आज़माई हो चुकी
उभर के ज़ख़्म-ए-वफ़ा आ गए हैं आँखों मेंवो हाल शीशा-ए-दिल की शिकस्तगी का है
गुज़र रहे हैं ये किस पुल-सिरात से हम लोगकि दिल में 'ताब' गुमाँ तक नहीं है जीने का
फिर से आँखों के साग़र छलकने लगे मौज-दर-मौज आँसू निकलने लगे'ताब' घर में वो मेहमान फिर आ गया जिस के आने की कोई ख़बर भी न थी
दास्ताँ ग़म की उसे 'ताब' सुनाते क्यूँ होकब रग-ए-संग से ख़ूँ का कभी धारा निकला
ख़ामोशियों की आग में जलता है मय-कदादिल-दादगान-ए-शो'ला-रुख़ाँ कुछ न कुछ तो हो
'ताब' अगर पत्थर हैं चश्म-ओ-गोश मिरेसन्नाटे की चीख़ सुनूँगा कैसे मैं
वो ख़ुदा हो कि नाख़ुदा ऐ 'दिल'डूबना है तो सोचता क्या है
खेल समझे हो ऐ दिल जिसेज़िंदगी है तमाशा नहीं
उन्स क्यूँकर न हो ऐ दिल मुझे वीरानों सेहर ख़राबे में मिरा घर नज़र आता है मुझे
ऐ 'दिल' उस की याद है गोया उसी का आइनामुज़्दा-ए-जाँ-बख़्श भी चलती हुई शमशीर भी
कितना हसीं था जुर्म-ए-ग़म-ए-दिल कि दो-जहाँदर पे हैं आज तक मिरे रंग-ए-क़ुबूल के
रह गया ख़्वाब-ए-दिल-आराम अधूरा किस काढल गई शब तो खुला है ये दरीचा किस का
ऐ 'दिल' इन्हें इदराक कहाँ नम्रतियों काजो कहते हैं पल भर में बयाबाँ से गुज़र जा
देखा था ख़्वाब में उन्हें नादिम तो क्या कहेंक्यूँ अब तक आ रहा है पसीना ख़याल में
और सब कुछ हो ज़माने को मुबारक ऐ 'दिल'याँ तो दामन में मोहम्मद के सिवा कुछ भी नहीं
ऐ 'दिल' बहुत ख़राब हैं हालात शहर केयाँ जिस किसी से बात करो मुख़्तसर करो
न ग़म-ए-दिल के ही बस के न ग़म-ए-दौराँ केइतने आज़ाद हुए तेरे गिरफ़्तार कि बस
भूल बैठे हूँ वो कहीं ऐ दिलआज क्यूँ इतने याद आए हैं
ऐ 'दिल' इस बारगह-ए-हुस्न में हूँ जब से मुक़ीमइश्क़ शायद कि मिरी तब-ए-रवाँ रक़्स में है
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