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ग़ज़ल
अभी से तू ने क़ातिल म्यान में तलवार क्यूँ रख ली
अभी तो जान थोड़ी सी तन-ए-'बिस्मिल' में बाक़ी है
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
क़ातिल ने तेग़ म्यान में कुछ सोच कर रखी
थोड़ा सा जब कि दम तन-ए-बिस्मिल में रह गया
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
ग़ज़ल
मैं ने कब रोक के रक्खा तुम्हें जान-ए-'बिस्मिल'
ज़ेहन-ओ-दिल क्या है मिरी रूह में दाख़िल हो जाओ
बिस्मिल आरिफ़ी
ग़ज़ल
ख़ुदा लगती कहो लिल्लाह सदाक़त को न झुटलाओ
तुम्हें अफ़्साना-ए-बेताबी-ए-'बिस्मिल' पसंद आया
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-'बिस्मिल' में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
ज़िक्र-ए-'बिस्मिल' पे वो फ़रमाने लगे झुँझला कर
होगा कोई चलो जाने दो हमें याद नहीं
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
क्या कहूँ अंजुमन-ए-नाज़ का हाल ऐ 'बिस्मिल'
सब के चर्चे रहे बस ज़िक्र तुम्हारा न रहा
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
हर किसी के नाम में तख़सीस होनी चाहिए
क्यों न ऐ 'बिस्मिल' मिटें हम ख़ंजर-ए-जल्लाद पर
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
कहाँ तक शिकवा-ए-बे-मेहरी-ए-अहबाब ऐ हमदम
ज़माना दरपए-आज़ार-ए-'बिस्मिल' होता जाता है
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
हज़रत-ए-'बिस्मिल' ये अच्छी दिल को सूझी दिल-लगी
कर दिया शमशीर-ए-क़ातिल का तमन्नाई मुझे
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
है यक़ीं हज़रत-ए-'बिस्मिल' की तरह हों बिस्मिल
आप अगर उन के तड़पने का तमाशा देखें