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ग़ज़ल
उन्हें मक़्सूद अगर तर्क-ए-वतन की आज़माइश है
तो हम समझेंगे अब रस्म-ए-कुहन की आज़माइश है
ज़िया असदी सिरोंजी
ग़ज़ल
पलकों की छागल तोड़ कर रिज़्क़-ए-ज़मीं बनते रहे
इन आँसुओं के वास्ते तर्क-ए-वतन अच्छा न था
अल्लामा तालिब जौहरी
ग़ज़ल
कर रहा हूँ दोस्तों के ज़ो'म पर तर्क-ए-वतन
शायद अब आग़ाज़-ए-दौर-ए-गर्दिश-ए-अय्याम है
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
यारान-ए-वतन को है ग़रीबों से किनारा
ग़ुर्बत का तक़ाज़ा है करो तर्क-ए-वतन अब
मुंशी बनवारी लाल शोला
ग़ज़ल
इक लफ़्ज़ याद था मुझे तर्क-ए-वफ़ा मगर
भूला हुआ हूँ ठोकरें खाने के बअ'द भी
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
जो भी हैं सुब्ह-ए-वतन ही के परस्तारों में हैं
किन से हम ऐ शाम-ए-ग़ुर्बत तेरा अफ़्साना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
हर शख़्स मो'तरिफ़ कि मुहिब्ब-ए-वतन हूँ मैं
फिर 'अदलिया ने क्यूँ सर-ए-मक़्तल क्या मुझे
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
बारहा उन से किया तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ 'बेबाक'
नींद की वादियाँ फिर उन से मिला देती हैं