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ग़ज़ल
और मत रक्खो मिरे काँधों पे ज़िम्मेदारियाँ
पहले ही कुछ कम नहीं है रोटी तरकारी का बोझ
ताहिर सऊद किरतपूरी
ग़ज़ल
हम को इस दौर-ए-तरक़्क़ी ने दिया क्या 'मेराज'
कल भी बर्बाद थे और आज भी बर्बाद हैं हम