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ग़ज़ल
वो तिरी गली के तेवर, वो नज़र नज़र पे पहरे
वो मिरा किसी बहाने तुझे देखते गुज़रना
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
न अब वो जल्वा-ए-यूसुफ़ न मिस्र का बाज़ार
न अब वो हुस्न के तेवर न अब वो दीवाने
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
मिरे सारे रक़ीबों ने ज़मीनें छोड़ दीं कब की
मगर अशआर से मेरे वो तेवर क्यूँ नहीं जाता
प्रबुद्ध सौरभ
ग़ज़ल
बिगड़े हुए तेवर हैं नौ-उम्र सियासत के
बिफरी हुई साँसें हैं नौ-मश्क़ निज़ामों की
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
उस के अना की वज़्अ थी सब से अलग 'फ़ज़ा'
क्या शख़्स था कि अपने ही तेवर से कट गया