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ग़ज़ल
सर्द हवाओं से तो थे साहिल के रेत के याराने
लू के थपेड़े सहने वाले सहराओं के टीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
ऐ मौज-ए-बला उन को भी ज़रा दो चार थपेड़े हल्के से
कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफ़ाँ का नज़ारा करते हैं
मुईन अहसन जज़्बी
ग़ज़ल
दिल अपना हरीफ़-ए-सैल-ए-बला अब क्या कहें कितना टूट गया
आज और थपेड़े टकराए आज और किनारा टूट गया
महशर बदायुनी
ग़ज़ल
ये तूफ़ाँ-ख़ेज़ मौजें ये थपेड़े बाद ओ बाराँ के
सफ़ीने को यूँही कहते रहो साहिल भी आएगा
वासिफ़ देहलवी
ग़ज़ल
थपेड़े उन को भी खाने पड़े अमवाज तूफ़ाँ के
मिरी कश्ती के बाइस ही किनारों को न चैन आया
कँवल डिबाइवी
ग़ज़ल
मिरी टूटी हुई कश्ती थपेड़े मौज-ए-तूफ़ाँ के
ख़ुदा-ए-पाक तेरे नाख़ुदा होने का वक़्त आया