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ग़ज़ल
किसी दिन बज़्म-ए-साक़ी से निकाले जाओगे 'क़ैसर'
निभाओगे कहाँ तक ठाठ ये शाहाना रोज़ाना
क़ैसर-उल जाफ़री
ग़ज़ल
कहो ये रिंदान-ए-एशिया से कि बज़्म-ए-इशरत के ठाठ बदले
उड़न-खटोला है अब मिसों का गई परीजान की वो डोली
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीरा लट पटा है
क्या क़त्ल कूँ हमारे अब ठाठ यूँ ठठा है
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
वो मोहब्बत की शुरू'आत वो बे-थाह ख़ुशी
देख कर उन को वो फूले न समाना दिल का
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
जंगल जंगल आग लगी है दरिया दरिया पानी है
नगरी नगरी थाह नहीं है लोग बहुत घबराए हैं
जमील अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
वही मक़्बूल लीडर और डिप्लोमैट होता है
जो मुँह से दिस कहे तो उस का मतलब दैट होता है
सरफ़राज़ शाहिद
ग़ज़ल
मिरा है रक्त हिन्दी ज़ात हिन्दी ठेठ हिन्दी हूँ
यही मज़हब यही फ़िरक़ा यही है ख़ानदाँ मेरा