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ग़ज़ल
मिरे सय्याद ने जिस जिस जगह तूदा बनाया था
वहाँ जा जा के बू लेते फिरे नख़चीर मिट्टी की
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
हर मज़हब बे-रूह जसद है जज़्बे की क़ल्लाशी है
राख के तूदे पूजते हैं ये का'बा है वो काशी है
इज्तिबा रिज़वी
ग़ज़ल
वहीं झड़-गुलों के तूदे बंधें गुलबनों के नीचे
कभू सुब्ह-दम चमन में जो वो ग़ुंचा-लब हो ख़ंदाँ
वलीउल्लाह मुहिब
ग़ज़ल
हम ख़ाक के तूदे पे खड़े पूछ रहे हैं
क्या लुत्फ़ मिला तुम को समुंदर के सफ़र में