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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ऐ 'मुसहफ़ी' उस्ताद-ए-फ़न-ए-रेख़्ता-गोई
तुझ सा कोई आलम को मैं छाना नहीं मिलता
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
शे'र पढ़िए बहर से ख़ारिज सर-ए-बज़्म-ए-सुख़न
और फिर उस्ताद-ए-फ़न्न-ए-शा'इरी बन जाइए
नोमान अज़हर मिसबाही
ग़ज़ल
जो फ़लक को छूने चले तो हम ज़मीं कह उठी कि ऐ मोहतरम
ये बुलंदी तेरी तो ख़्वाब है ये उड़ान तेरी सराब है
सईद अहमद सईद कड़वी
ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
यूँ तो उस्ताद-ए-फ़न-ए-शेर बहुत से गुज़रे
किस को कहते हैं ग़ज़ल-गोई 'असर' 'मीर' से पूछ