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ग़ज़ल
मौसम बदला रुत गदराई अहल-ए-जुनूँ बेबाक हुए
फ़स्ल-ए-बहार के आते आते कितने गिरेबाँ चाक हुए
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
कभी अहल-ए-जुनूँ भी मस्लहत से काम लेते हैं
तुम्हें जब याद करते हैं ख़ुदा का नाम लेते हैं
मयकश अकबराबादी
ग़ज़ल
रहने दे ये तंज़ के नश्तर अहल-ए-जुनूँ बेबाक नहीं
कौन है अपने होश में ज़ालिम किस का गरेबाँ चाक नहीं
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
ग़ज़ल
हम को ख़याल-ए-ख़िदमत-ए-अह्ल-ए-जहाँ तो है
ताक़त नहीं है पाँव में मुँह में ज़बाँ तो है
मुसव्विर लखनवी
ग़ज़ल
सज्दा-गाह-ए-अहल-ए-दिल बा'द-ए-फ़ना हो जाइए
सफ़्हा-ए-हस्ती पे इक नक़्श-ए-वफ़ा हो जाइए