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ग़ज़ल
मुझे आता है क्या क्या रश्क वक़्त-ए-ज़ब्ह उस से भी
गला जिस दम लिपट कर ख़ंजर-ए-क़ातिल से मिलता है
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
ज़ब्ह कर के मुझे नादिम ये हुआ वो क़ातिल
हाथ में फिर कभी ख़ंजर न लिया मेरे बा'द
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
ज़ुल्म से गर ज़ब्ह भी कर दो मुझे परवा नहीं
लुत्फ़ से डरता हूँ ये मेरी क़ज़ा हो जाएगा
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
उधर मुँह फेर कर क्या ज़ब्ह करते हो इधर देखो
मिरी गर्दन पे ख़ंजर की रवानी देखते जाओ
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
तिरे नौकर तिरे दर पर 'असद' को ज़ब्ह करते हैं
सितमगर नाख़ुदा तरस-आश्ना-कुश माजरा क्या है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
जहाँ इंसानियत वहशत के हाथों ज़ब्ह होती हो
जहाँ तज़लील है जीना वहाँ बेहतर है मर जाना
गुलज़ार देहलवी
ग़ज़ल
ज़मज़मे सुन कर मिरे सय्याद-ए-गुल-रू ने कहा
ज़ब्ह कीजे ऐसे बुलबुल को न छोड़ा चाहिए
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
ये अजीब माजरा है कि ब-रोज़-ए-ईद-ए-क़ुर्बां
वही ज़ब्ह भी करे है वही ले सवाब उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
अगर हाथों से उस शीरीं-अदा के ज़ब्ह होंगे हम
तो शर्बत के से घूँट आब-ए-दम-ए-ख़ंजर में आवेंगे
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
दोस्त ने जब न दम-ए-ज़ब्ह सिसकता छोड़ा
मेरे दुश्मन हुए हँस हँस के पशेमाँ क्या क्या