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ग़ज़ल
उस शहर में कितने चेहरे थे कुछ याद नहीं सब भूल गए
इक शख़्स किताबों जैसा था वो शख़्स ज़बानी याद हुआ
नोशी गिलानी
ग़ज़ल
मुझ से क्या कुछ न सबा कह के गई है ऐ 'ज़ेब'
चंद ही लफ़्ज़ों में पैग़ाम-ए-ज़बानी की तरह
ज़ेब ग़ौरी
ग़ज़ल
गुज़रती है जो दिल पर वो कहानी याद रखता हूँ
मैं हर गुल-रंग चेहरे को ज़बानी याद रखता हूँ
फ़ाज़िल जमीली
ग़ज़ल
सौ क़िस्सों से बेहतर है कहानी मिरे दिल की
सुन उस को तू ऐ जान ज़बानी मिरे दिल की
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
जो बात शर्त-ए-विसाल ठहरी वही है अब वज्ह-ए-बद-गुमानी
इधर है इस बात पर ख़मोशी उधर है पहली से बे-ज़बानी