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ग़ज़ल
हम तो रहवार-ए-ज़बूँ हैं वो मुक़द्दर का सवार
ख़ुद ही महमेज़ करे ख़ुद ही इनाँ खेंचता है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अब जो रोते हैं मिरे हाल-ए-ज़बूँ पर 'अख़्तर'
कल यही थे मुझे हँस हँस के रुलाने वाले
अख़्तर सईद ख़ान
ग़ज़ल
ख़याल-ए-मर्ग कब तस्कीं दिल-ए-आज़ुर्दा को बख़्शे
मिरे दाम-ए-तमन्ना में है इक सैद-ए-ज़बूँ वो भी
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
तू ख़ुद है ख़ार-अो-ज़बूँ हिर्स-ओ-आज़-ए-दुनिया में
खुलेगा तुझ पे कहाँ जो जहाँ है पोशीदा
अनवर सदीद
ग़ज़ल
शरीक-ए-बुलबुल-ओ-क़ुमरी हैं वो ज़बूँ-फ़ितरत
जो बे-क़रार रहे सैर-ए-गुलसिताँ के लिए