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ग़ज़ल
'दानिश' ज़ह-ए-नसीब मिले ज़ख़्म-ए-लाला-रंग
हर ज़ख़्म-ए-दिल को उन की निशानी लिखा करो
दानिश फ़राही
ग़ज़ल
होना था हश्र-ए-हसरत-ओ-हिर्मां अगर यही
'रहबर' ज़ह-ए-नसीब कि तू पीर हो गया
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ग़ज़ल
झुकेगी रफ़्ता रफ़्ता शाख़-ए-नख़्ल-ए-क़द कमाँ हो कर
खिंचेगा तूल फ़ुर्क़त का ज़ह-ए-तीर-ए-फ़ुग़ाँ हो कर
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
ग़ज़ल
धनक से सुरमे की चिल्ला है ता ब-गोशा-ए-चशम
कोई है सैद जो फिर ज़ह हुई कमान-ए-निगाह
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
जाफ़र ताहिर
ग़ज़ल
हो गईं रौशन मिरी आँखें ज़हे-ए-नूर-ए-जमाल
दीदनी है वो और उस के हुस्न का ए'जाज़ भी