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ग़ज़ल
राफ़िया ज़ैनब
ग़ज़ल
कभी मुक़द्दर जो ये इनायत करे तो क्या हो
बिछड़ के मुझ से वो मेरी चाहत करे तो क्या हो
राफ़िया ज़ैनब
ग़ज़ल
कलाम करती हूँ ज़ैनब के लहजे में 'बुशरा'
मैं दीं की राह में बेटे निसार करती हूँ