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ग़ज़ल
ये और बात कि अनजाने लग़्ज़िशें हो जाएँ
मगर शुऊ'र-ए-हराम-ओ-हलाल रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
मिरे अन्फ़ास की हर ज़र्ब थी कारी से कारी-तर
करम फ़रमा हुआ अर्श-ए-बरीं आहिस्ता आहिस्ता
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
ज़र्ब-ए-ग़म-ए-हयात से शीशा-ए-क़ल्ब टूट कर
जुड़ न सकेगा फिर कभी जाम-ए-शराब की तरह
बिर्ज लाल रअना
ग़ज़ल
वो शिकस्त-ए-दिल जो हो मरहून-ए-ज़र्ब-ए-ज़िक्र-ए-दोस्त
जज़्ब-ओ-मस्ती को सरोश-ए-साज़-ए-ख़ुश-आहंग है
फ़ैज़ झंझानवी
ग़ज़ल
बुतान-ए-आज़री सज्दे में गिर पड़ेंगे सभी
ये ज़र्ब-ए-ला-इलह जब तक तिरी अज़ान में है
सय्यद ज़फ़र काशीपुरी
ग़ज़ल
मिरा सज्दा है ज़र्ब-ए-बुत-शिकन पिंदार के सर पर
यहाँ इस राज़ से वाक़िफ़ कोई हम-सर नहीं मिलता
मुख़्तारुद्दीन
ग़ज़ल
असीरान-ए-फ़रेब-आराइ-ए-दैर-ओ-हरम आख़िर
सुलगते 'आरिज़ों की दिलकशी का राज़ क्या जानें
जगदीश मेहता दर्द
ग़ज़ल
अल्लह अल्लह शौक़-ए-सज्दा-रेज़ी-ए-दैर-ओ-हरम
ये जबीं झुकते ही तेरे आस्ताँ तक आ गई