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ग़ज़ल
ये ज़र्दा चीज़ है जो हर जगह है बाइ'स-ए-शौकत
सुनी है आलम-ए-बाला में भी ता'मीर सोने की
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
देखते ही देखते ये रुत भी क्या ज़र्दा गई
सब्ज़ मौसम था तो सहरा में भी सन्नाटा न था
सय्यद अहमद शमीम
ग़ज़ल
क़ोरमा ज़र्दा हो बिरयानी हो बूरानी हो
हाँडी मौक़ूफ़ के तकिए में ये दीवानी हो
इनायत अली ख़ान इनायत
ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
बशीर बद्र
ग़ज़ल
मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ