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ग़ज़ल
शुआ-ए-महर शबनम की बक़ा क्या छीन सकती थी
ये क़तरे ख़ुद में ज़र्फ़-ए-बे-कराँ रखते तो अच्छा था
मुसव्विर करंजवी
ग़ज़ल
'कँवल' मय-ख़्वार क्या जाने सुरूर-ए-बे-ख़ुदी क्या है
उसी से पूछिए जो बे-पिए सरशार हो जाए
कँवल एम ए
ग़ज़ल
हर रंग की साक़ी तिरे मयख़ाने में पी ली
अब तो मिरा साग़र मय-ए-बे-रंग से भर दे
सय्यद बशीर हुसैन बशीर
ग़ज़ल
बे-मय-ओ-मय-ख़ाना-ओ-साक़ी जो आई मुझ को मौत
हल्क़ा-ए-मातम है दौर-ए-चर्ख़-ए-मीनाई नहीं
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
तू ने क्या चीज़ बना दी निगह-ए-सेहर-तराज़
वो जो थी शीशा-ए-दिल में मय-ए-बे-नाम अभी
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
कोई मस्त-ए-मय-कदा आ गया मय-ए-बे-ख़ुदी वो पिला गया
न सदा-ए-नग़्मा-ए-दैर उठी न हरम से शोर-ए-अज़ाँ उठा
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
मस्त-ओ-बे-ख़ुद तेरे मय-ख़ाने का बाम-ओ-दर बने
साक़िया गर तेरी चश्म-ए-मस्त का साग़र बने