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ग़ज़ल
मय तुंद ओ ज़र्फ़-ए-हौसला-ए-अहल-ए-बज़्म तंग
साक़ी से जाम भर के पिलाया न जाएगा
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
मैं क्या किया कि मुझ को निकाले है वो सनम
ऐ अहल-ए-बज़्म कोई तो बोलो ख़ुदा लगी
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
निकालते हैं मुझे बज़्म-ए-अहल-ए-सुख़नाँ से
ख़बर नहीं जिन्हें आदाब-ए-शायरी क्या है
अल-हाज अल-हाफीज़
ग़ज़ल
कौन था जो दस्त-ए-क़ातिल के लिए तय्यार था
एक मैं ही बज़्म-ए-अहल-ए-ख़्वाब में बेदार था
आबिद जाफ़री
ग़ज़ल
नासेह ने मेरे हक़ में कहा अहल-ए-बज़्म से
बिगड़ी हुई को आह कहाँ तक सँवारिए