aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zarii"
फिर दिया पारा-ए-जिगर ने सवालएक फ़रियाद ओ आह-ओ-ज़ारी है
नाला फ़रियाद आह और ज़ारीआप से हो सका सो कर देखा
गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिएमेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
जो चेहरा देखा वो तोड़ा नगर नगर वीरान किएपहले औरों से ना-ख़ुश थे अब ख़ुद से बे-ज़ारी है
हो गई दिल से तिरी याद भी रुख़्सत शायदआह-ओ-ज़ारी का अभी शोर उठा है मुझ में
जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थीजान का काम फ़क़त जान-फ़रोशी निकला
हुए बर्बाद तो अब आह-ओ-ज़ारी कर रहे हो तुमकहा भी था सियासत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना
काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दीपर हैफ़ तिरे दिल में मोहब्बत न ज़री दी
आँख उठा कर जो रवादार न था देखने कावही दिल करता है अब मिन्नत ओ ज़ारी उस की
आप करते हैं शबनमी बातेंऔर मिरी प्यास रेग-ज़ारी है
बे-नाला-ओ-बे-ज़ारी बे-ख़स्तगी-ओ-ख़ारीइमरोज़ कभी अपना फ़र्दा न हुआ होगा
बे-ज़री का न कर गिला ग़ाफ़िलरह तसल्ली कि यूँ मुक़द्दर था
सिर्फ़ मातम और ज़ारी से ही जिस का हल मिलेइस तरह का तो कहीं भी मसअला कोई नहीं
दिन के नाले न गए रात की ज़ारी न गईन गई दिल से कभी याद तुम्हारी न गई
ब-हज़ार उम्मीद-वारी रही एक अश्क-बारीन हुआ हुसूल-ए-ज़ारी ब-जुज़ आस्तीं-फ़िशानी
नौबत-ए-गिरिया ओ बेताबी-ओ-ज़ारी आईबड़े हंगामे से कल याद तुम्हारी आई
लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भीअब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन-सारी भी
हिज्र की घड़ियाँ कठिन होती गईंदिन के नाले रात की ज़ारी बढ़ी
तू सोच भी नहीं सकता जिस एहतिमाम के साथकटे शजर पे परिंदों ने आह-ओ-ज़ारी की
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