मन बै-रागी तन अनुरागी क़दम क़दम दुश्वारी है
मन बै-रागी तन अनुरागी क़दम क़दम दुश्वारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फ़नकारी है
औरों जैसे हो कर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधा-पन है कुछ अपनी अय्यारी है
जब जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया
हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनिया-दारी है
ऐब नहीं है इस में कोई लाल-परी ना फूल-कली
ये मत पूछो वो अच्छा है या अच्छी नादारी है
जो चेहरा देखा वो तोड़ा नगर नगर वीरान किए
पहले औरों से ना-ख़ुश थे अब ख़ुद से बे-ज़ारी है
- पुस्तक : Sheher Men Gaon (पृष्ठ 197)
- रचनाकार : Shahid Mahili
- प्रकाशन : Miaar Publications (2012)
- संस्करण : 2012
- पुस्तक : Duniya Jise Kahte Hain
- प्रकाशन : रेख़्ता पब्लिकेशंस
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