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ग़ज़ल
हो सकेगी किस तरह सर्फ़-ए-क़लम रूदाद-ए-दिल
अब भी ज़ेर-ए-ग़ौर सुर्ख़ी ग़म के अफ़्साने की है
ज़ेब बरैलवी
ग़ज़ल
मेरे इल्हाम-ए-सुख़न में फ़ैज़ है सीमाब का
'ज़ेब' बज़्म-ए-शेर में मुम्ताज़ होना चाहिए
ज़ेब बरैलवी
ग़ज़ल
हमें ऐ 'ज़ेब' क़ल्ब-ए-माहियत की भी तो आदत है
परेशानी से हम अक्सर सुकूँ का काम लेते हैं
ज़ेब बरैलवी
ग़ज़ल
तजल्ली हुस्न-ए-ज़ेबा की बहारें रू-ए-रौशन की
इन्हीं रंगीनियों में दिल भी शायद खो गया मेरा
ज़ेब बरैलवी
ग़ज़ल
जो एहसास-ए-जवानी की हसीं ख़ल्वत में पलते हैं
वो जल्वे मंज़र-ए-जज़्बात पर लाने भी होते हैं
ज़ेब बरैलवी
ग़ज़ल
नियाज़-ओ-नाज़ के साग़र खनक जाएँ तो अच्छा है
तिरे मय-कश तिरे दर पर भटक जाएँ तो अच्छा है
ज़ेब बरैलवी
ग़ज़ल
दिल के हर पर्दे से आती थीं सदाएँ दर्द की
बरबत-ए-हस्ती पे तुम को नग़्मा-ख़्वाँ समझा था मैं