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ग़ज़ल
मैं ज़ेर-ए-साया कहीं महव-ए-ख़्वाब था भी नहीं
कि आ के धूप जगाती मैं जागता भी नहीं
अख़लाक़ बन्दवी
ग़ज़ल
हलीमा सादिया शगुफ़्ता
ग़ज़ल
मंज़िल कड़ी थी पेश-ए-नज़र और हम-सफ़र
ख़ुश थे कि ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-यार थे
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
उठेंगे ये जभी जब ख़ुद क़ज़ा आ कर उठाएगी
जो इस कूचे में ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार बैठे हैं
नवाब सैफ अली सय्याफ़
ग़ज़ल
वो ज़ेर-ए-साया-ए-अल्ताफ़-ए-बाग़बान में था
जो आशियाना ज़द-ए-बर्क़-ए-बे-अमान में था
आतिश बहावलपुरी
ग़ज़ल
मक़ाम-ए-ख़ुसरवी-ओ-बज़्म-ए-जम का ज़िक्र ही क्या
कि ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-यार हम भी हैं