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ग़ज़ल
महशर बदायुनी
ग़ज़ल
बातों बातों में मिरे सर को कटा देगा रक़ीब
इस क़दर सैफ़-ज़ुबाँ था मुझे मालूम न था
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
हो न हो तू ने ही काटी है ज़ुबाँ-ए-जहल 'यास'
दूसरा तेरे सिवा इस फ़न का माहिर कौन था
नूर मोहम्मद यास
ग़ज़ल
मानिंद-ए-ख़ामा तेरी ज़बाँ पर है हर्फ़-ए-ग़ैर
बेगाना शय पे नाज़िश-ए-बेजा भी छोड़ दे