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नज़्म
हाँ देखा कल हम ने उस को देखने का जिसे अरमाँ था
वो जो अपने शहर से आगे क़र्या-ए-बाग़-ओ-बहाराँ था
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मैं अक्सर देखने जाता था उस को जिस की माँ मरती
और अपने दिल में कहता था ये कैसा शख़्स? है अब भी
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
बरसों बा'द जब उस को देखा फूल सा चेहरा बदल चुका था
पेशानी पर फ़िक्र की आयत आँखें अब संजीदा थीं