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नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनिया
मज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अपना हक़ माँग मगर उन के तआ'वुन से न माँग
जो तिरे हक़ का तसव्वुर ही फ़ना कर डालें
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये गीत मिस्ल-ए-शोला-ए-जव्वाला तुंद-ओ-तेज़
इस की लपक से बाद-ए-फ़ना का जिगर गुदाज़