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नज़्म
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मिरे जद हाशिम-ए-आली गए ग़़ज़्ज़ा में दफ़नाए
मैं नाक़े को पिलाऊँगा मुझे वाँ तक वो ले जाए
जौन एलिया
नज़्म
मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता
सकूँ लेकिन मिरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
लब-ए-लालीं पे लाखा है न रुख़्सारों पे ग़ाज़ा है
जबीं-ए-नूर-अफ़्शाँ पर न झूमर है न टीका है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तुम अगर रूठो तो इक तुम को मनाने के लिए
गीत गा सकता हूँ मैं आँसू बहा सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सीम-ओ-ज़र नान-ओ-नमक आब-ओ-ग़िज़ा कुछ भी नहीं
घर में इक ख़ामोश मातम के सिवा कुछ भी नहीं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
काँपता फिरता है क्या रंग-ए-शफ़क़ कोहसार पर
ख़ुश-नुमा लगता है ये ग़ाज़ा तिरे रुख़्सार पर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीम
दिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानी