aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",InGv"
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ पल दो पल मिरी कहानी हैपल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मिरी जवानी हैमुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गएकुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गएवो भी इक पल का क़िस्सा थे मैं भी इक पल का क़िस्सा हूँकल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँपल दो पल में कुछ कह पाया इतनी ही स'आदत काफ़ी हैपल दो पल तुम ने मुझ को सुना इतनी ही ‘इनायत काफ़ी हैकल और आएँगे नग़्मों की खिलती कलियाँ चुनने वालेमुझ से बेहतर कहने वाले तुम से बेहतर सुनने वालेहर नस्ल इक फ़स्ल है धरती की आज उगती है कल कटती हैजीवन वो महँगी मदिरा है जो क़तरा क़तरा बटती हैसागर से उभरी लहर हूँ मैं सागर में फिर खो जाऊँगामिट्टी की रूह का सपना हूँ मिट्टी में फिर सो जाऊँगाकल कोई मुझ को याद करे क्यूँ कोई मुझ को याद करेमसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगीलोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगेये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ होजगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ होउँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगेकाँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगेफिर कहेंगे कि हँसी में भी ख़फ़ा होती हैंअब तो 'रूही' की नमाज़ें भी क़ज़ा होती हैंलोग ज़ालिम हैं हर इक बात का तअना देंगेबातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगेइन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेनावर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगेचाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन सेमेरे बारे में कोई बात न करना उन सेबात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
मैं जब भीज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप करमैं जब भीदूसरों के और अपने झूट से थक करमैं सब से लड़ के ख़ुद से हार केजब भी उस एक कमरे में जाता थावो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरावो बेहद मेहरबाँ कमराजो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता थाजैसे कोई माँबच्चे को आँचल में छुपा लेप्यार से डाँटेये क्या आदत हैजलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुमवो कमरा याद आता हैदबीज़ और ख़ासा भारीकुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ाकि जैसे कोई अक्खड़ बापअपने खुरदुरे सीने मेंशफ़क़त के समुंदर को छुपाए होवो कुर्सीऔर उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस कीवो दोनोंदोस्त थीं मेरीवो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईनाजो दिल का अच्छा थावो बे-हँगम सी अलमारीजो कोने में खड़ीइक बूढ़ी अन्ना की तरहआईने को तंबीह करती थीवो इक गुल-दाननन्हा साबहुत शैतानउन दिनों पे हँसता थादरीचाया ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहटऔर दरीचे पर झुकी वो बेलकोई सब्ज़ सरगोशीकिताबेंताक़ में और शेल्फ़ परसंजीदा उस्तानी बनी बैठींमगर सब मुंतज़िर इस बात कीमैं उन से कुछ पूछूँसिरहानेनींद का साथीथकन का चारा-गरवो नर्म-दिल तकियामैं जिस की गोद में सर रख केछत को देखता थाछत की कड़ियों मेंन जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थींवो छोटी मेज़ परऔर सामने दीवार परआवेज़ां तस्वीरेंमुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थींमुस्कुराती थींउन्हें शक भी नहीं थाएक दिनमैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगामैं इक दिन यूँ भी जाऊँगाकि फिर वापस न आऊँगा
वो ज़िंदगी से कहता थाकि तुझ को मैं सजाऊँगातू मुझ से चाँद माँग लेमैं चाँद ले के आऊँगा
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
तुम रूठ चुके दिल टूट चुका अब याद न आओ रहने दोइस महफ़िल-ए-ग़म में आने की ज़हमत न उठाओ रहने दोये सच कि सुहाने माज़ी के लम्हों को भुलाना खेल नहींये सच कि भड़कते शोलों से दामन को बचाना खेल नहींरिसते हुए दिल के ज़ख़्मों को दुनिया से छुपाना खेल नहींऔराक़-ए-नज़र से जल्वों की तहरीर मिटाना खेल नहींलेकिन ये मोहब्बत के नग़्मे इस वक़्त न गाओ रहने दोजो आग दबी है सीने में होंटों पे न लाओ रहने दोजारी हैं वतन की राहों में हर सम्त लहू के फ़व्वारेदुख-दर्द की चोटें खा खा कर लर्ज़ां हैं दिलों के गहवारेअंगुश्त ब-लब हैं शम्स ओ क़मर हैरान ओ परेशाँ हैं तारेहैं बाद-ए-सहर के झोंके भी तूफ़ान-ए-मुसलसल के धारेअब फ़ुर्सत-ए-नाव-नोश कहाँ अब याद न आओ रहने दोतूफ़ान में रहने वालों को ग़ाफ़िल न बनाओ रहने दोमाना कि मोहब्बत की ख़ातिर हम तुम ने क़सम भी खाई थीये अम्न-ओ-सुकूँ से दूर फ़ज़ा पैग़ाम-ए-सुकूँ भी लाई थीवो दौर भी था जब दुनिया की हर शय पे जवानी छाई थीख़्वाबों की नशीली बद-मस्ती मासूम दिलों पर छाई थीलेकिन वो ज़माना दूर गया अब याद न आओ रहने दोजिस राह पे जाना लाज़िम है उस से न हटाओ रहने दोअब वक़्त नहीं उन नग़्मों का जो ख़्वाबों को बेदार करेंअब वक़्त है ऐसे नारों का जो सोतों को होश्यार करेंदुनिया को ज़रूरत है उन की जो तलवारों को प्यार करेंजो क़ौम ओ वतन के क़दमों पर क़ुर्बानी दें ईसार करेंरूदाद-ए-मोहब्बत फिर कहना अब मान भी जाओ रहने दोजादू न जगाओ रहने दो फ़ित्ने न उठाओ रहने दोमैं ज़हर-ए-हक़ीक़त की तल्ख़ी ख़्वाबों में छुपाऊँगा कब तकग़ुर्बत के दहकते शोलों से दामन को बचाऊँगा कब तकआशोब-ए-जहाँ की देवी से यूँ आँख चुराऊँगा कब तकजिस फ़र्ज़ को पूरा करना है वो फ़र्ज़ भुलाऊँगा कब तकअब ताब नहीं नज़्ज़ारे की जल्वे न दिखाओ रहने दोख़ुर्शीद-ए-मोहब्बत के रुख़ से पर्दे न उठाओ रहने दोमुमकिन है ज़माना रुख़ बदले ये दौर-ए-हलाकत मिट जाएये ज़ुल्म की दुनिया करवट ले ये अहद-ए-ज़लालत मिट जाएदौलत के फ़रेबी बंदों का ये किब्र और नख़वत मिट जाएबर्बाद वतन के महलों से ग़ैरों की हुकूमत मिट जाएउस वक़्त ब-नाम-ए-अहद-ए-वफ़ा मैं ख़ुद भी तुम्हें याद आऊँगामुँह मोड़ के सारी दुनिया से उल्फ़त का सबक़ दुहराऊँगा
(2)मत रो बच्चेरो रो के अभीतेरी अम्मी की आँख लगी हैमत रो बच्चेकुछ ही पहलेतेरे अब्बा नेअपने ग़म से रुख़्सत ली हैमत रो बच्चेतेरा भाईअपने ख़्वाब की तितली पीछेदूर कहीं परदेस गया हैमत रो बच्चेतेरी बाजी काडोला पराए देस गया हैमत रो बच्चेतेरे आँगन मेंमुर्दा सूरज नहला के गए हैंचंद्रमा दफ़ना के गए हैंमत रो बच्चेअम्मी, अब्बा, बाजी, भाईचाँद और सूरजतू गर रोएगा तो ये सबऔर भी तुझ को रुलवाएेंगेतू मुस्काएगा तो शायदसारे इक दिन भेस बदल करतुझ से खेलने लौट आएँगे
दर्द थम जाएगा ग़म न कर, ग़म न करयार लौट आएँगे, दिल ठहर जाएगा, ग़म न कर, ग़म न करज़ख़्म भर जाएगाग़म न कर, ग़म न करदिन निकल आएगाग़म न कर, ग़म न करअब्र खुल जाएगा, रात ढल जाएगीग़म न कर, ग़म न कररुत बदल जाएगीग़म न कर, ग़म न कर
लड़की!ये लम्हे बादल हैंगुज़र गए तो हाथ कभी नहीं आएँगेइन के लम्स को पीती जाक़तरा क़तरा भीगती जाभीगती जा तू जब तक इन में नम हैऔर तिरे अंदर की मिट्टी प्यासी हैमुझ से पूछकि बारिश को वापस आने का रस्ता कभी न याद हुआबाल सुखाने के मौसम अन-पढ़ होते हैं!
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलामइज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भीदिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहालख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़यालदेखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हालसकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलालतन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग हैक्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाहनूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाहजुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आहली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राहचेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगाआख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुलाअफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुलाइक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुलावा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुलादर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से 'अयाँ हुआरो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँमैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँसब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँलेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँकिस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँजोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँदुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीदअंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीदअंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीदलिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्तेफैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्तेलेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कममैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज कोकिन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहालपूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बालछटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्तेक्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्तेऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़रघर जिन के बे-चराग़ रहे आह 'उम्र भररहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समरये जा-ए-सब्र थी कि दु'आ में नहीं असरलेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गयासरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाहमंजधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राहअब याँ से कूच हो तो 'अदम में मिले पनाहतक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करेसुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाएनाशाद हम को देख के माँ और मर न जाएफिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूरसदमा ये शाक़ 'आलम-ए-पीरी में है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूरशायद ख़िज़ाँ से शक्ल 'अयाँ हो बहार कीकुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार कीये जा'ल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शरहोना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सरअस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़रक्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गरख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहींमंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहींराहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशारवाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगारतुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गारमातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवारसख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहींदुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगाबच्चों के दहन से बोलूँगाचिड़ियों की ज़बाँ से गाऊँगाजब बीज हँसेंगे धरती मेंऔर कोंपलें अपनी उँगली सेमिट्टी की तहों को छेड़ेंगीमैं पत्ती पत्ती कली कलीअपनी आँखें फिर खोलूँगासरसब्ज़ हथेली पर ले करशबनम के क़तरे तौलूँगामैं रंग-ए-हिना आहंग-ए-ग़ज़लअंदाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगारुख़्सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरहहर आँचल से छन जाऊँगाजाड़ों की हवाएँ दामन मेंजब फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ को लाएँगीरह-रौ के जवाँ क़दमों के तलेसूखे हुए पत्तों से मेरेहँसने की सदाएँ आएँगीधरती की सुनहरी सब नदियाँआकाश की नीली सब झीलेंहस्ती से मिरी भर जाएँगीऔर सारा ज़माना देखेगाहर क़िस्सा मिरा अफ़्साना हैहर आशिक़ है 'सरदार' यहाँहर माशूक़ा 'सुल्ताना' है
मैं रंगों में हूँ कभी बरश मेंकभी कैनवस पे सजी हूँ मैंमैं क़ौस-ए-क़ुज़ह हूँ हुरूफ़ कीअल्फ़ाज़ की इक लड़ी हूँ मैंमुझे ख़ुद भी अपना पता नहींमैं कहाँ नहीं और कहाँ हूँ मैंअब तलाश करने से फ़ाएदामैं जो मिल भी जाऊँ तो क्या भलाफिर भी एक ख़लिश सी हैतेरी जुस्तुजू सुब्ह शाम हैये जो ख़्वाहिशें हैं फ़ुज़ूल सीइक 'उम्र से मिरे साथ हैंजो मैं दामन इन से छुड़ा सकूँतो सुकूँ तसव्वुफ़ में पा सकूँमगर शफ़्फ़ाफ़ पर्दे तसव्वुफ़ के हैंमुझे किस तरह से छुपाएँगेमुझे क़ैद करना मुहाल हैमैं मगन हूँ अपनी ही ज़ात मेंकौन-ओ-मकाँ से बे-ख़बरमुझे आरज़ू थी कभी मिलेकोई राज़-दाँ कोई हम-नवामगर कभी कोई ऐसा मिला नहींजहाँ रो सकूँ कभी रख के सरजो मिला वो अपना ही कांधा हैजहाँ रोती हूँ मैं झुका के सरमैं मुहीब रात का पहर हूँनहीं सहर मेरे नसीब मेंये सहर तेरी है तो रख इसेमैं तो सहर से बहुत दूर हूँमैं न हाथ अब कभी आऊँगीमुझे ढूँढना भी फ़ुज़ूल हैये जो रास्ते हैं चहार-सूले जाएँगे मुझे कू-ब-कूबहुत मंज़िलें हैं यहाँ वहाँमेरी मंज़िल इन मेंकोई नहींहाँ मेरी मंज़िल नहीं कोईमैं तो अपनी मंज़िल आप हूँ
मिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँये मेरा चेहरा ये मेरी आँखेंबुझे हुए से चराग़ जैसेजो फिर से चलने के मुंतज़िर होंवो चाँद-चेहरा सितारा-आँखेंवो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंजिन्हों ने पैमाँ किए थे मुझ सेरफ़ाक़तों के मोहब्बतों केकहा था मुझ से कि ऐ मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा केजहाँ भी जाएगा हम भी आएँगे साथ तेरेबनेंगे रातों में चाँदनी हम तो दिन में साए बिखेर देंगेवो चाँद-चेहरा सितारा-आँखेंवो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंवो अपने पैमाँ रफ़ाक़तों के मोहब्बतों केशिकस्त कर केन जाने अब किस की रहगुज़र का मनारा-ए-रौशनी हुए हैंमगर मुसाफ़िर को क्या ख़बर हैवो चाँद-चेहरा तो बुझ गया हैसितारा-आँखें तो सो गई हैंवो ज़ुल्फ़ें बे-साया हो गई हैंवो रौशनी और वो साए मिरी अता थेसो मेरी राहों में आज भी हैंकि मैं मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा कावो चाँद-चेहरा सितारा-आँखेंवो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंहज़ारों चेहरों हज़ारों आँखोंहज़ारों ज़ुल्फ़ों का एक सैलाब-ए-तुंद ले करमिरे तआक़ुब में आ रहे हैंहर एक चेहरा है चाँद-चेहराहैं सारी आँखें सितारा-आँखेंतमाम हैंमेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंमैं किस को चाहूँ मैं किस को चूमूँमैं किस के साए में बैठ जाऊँबचूँ कि तूफ़ाँ में डूब जाऊँन मेरा चेहरा न मेरी आँखेंमिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगीलोग बे-वजह उदासी का सबब पूछेंगेये भी पोछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ होउँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगेकाँपते हाथों पे फ़िक़रे भी कसे जाएँगेलोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ता'ना देंगेबातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगेउन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेनावर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगेचाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन सेमेरे बारे में कोई बात न करना उन सेबात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
साल में इक बार आता हैआते ही मुझ से कहता है''कैसे होअच्छे तो होलाओ इस बात पे केक खिलाओरात के खाने में क्या हैऔर कहो क्या चलता है''फिर इधर उधर की बातें करता रहता हैफिर घड़ी देख के कहता है''अच्छा तो मैं जाता हूँप्यारे अब मैंएक साल के ब'अद आऊँगाकेक बना के रखनासाथ में मछली भी खाऊंगा''और चला जाता है!उस से मिल करथोड़ी देर मज़ा आता है!लेकिन फिर मैं सोचता हूँख़ास मज़ा तो तब आएगाजब वो आ करमुझ को ढूँढता रह जाएगा!!
लाला-ओ-गुल के तबस्सुम से शफ़क़ फूलेगीहर तरफ़ रंग नज़र आएँगे बाहम कितने
वो कैसी तारीक घड़ी थीजब मुझ को एहसास हुआ थामैं तन्हा हूँउस दिन भी सीधा-सादा सूरज निकला थाशहर में कोई शोर नहीं थाघर में कोई और नहीं थाअम्माँ आटा गूँध रही थींअब्बा चारपाई पर बैठे ऊँघ रहे थेधीरे धीरे धूप चढ़ी थीऔर अचानक दिल में ये ख़्वाहिश उभरी थीमैं दुनिया से छुट्टी ले लूँअपने कमरे को अंदर से ताला दे कर कुंजी खो करज़ोर से चीख़ूँ चीख़ता जाऊँलेकिन कोई न सुनने पाएचाक़ू से एक एक रग-ओ-रेशे को काटूँऔर भयानक सच्चाई का दरिया फूटेहर कपड़े को आग लगा दूँशो'लों में नंगे-पन का सन्नाटा कूदेवो दिन था और आज का दिन हैकमरे के अंदर से ताला लगा हुआ हैकुंजी गुम हैमैं ज़ोरों से चीख़ रहा हूँमेरे जिस्म का एक एक रेशा कटा हुआ हैसब कपड़ों में आग लगी हैबाहर सब पहले जैसा हैकोई नहीं जो कमरे का दरवाज़ा तोड़ेकोई नहीं जो अपना खेल ज़रा सा छोड़े
नए साथी तिरे आँगन में जब धूमें मचाएँगेतो शायद हम भी ऐ स्कूल तुझ को याद आएँगे
कब तक मुझ से प्यार करोगेकब तक?जब तक मेरे रहम से बच्चे की तख़्लीक़ का ख़ून बहेगाजब तक मेरा रंग है ताज़ाजब तक मेरा अंग तना हैपर इस के आगे भी तो कुछ हैवो सब क्या हैकिसे पता हैवहीं की एक मुसाफ़िर मैं भीअनजाने का शौक़ बड़ा हैपर तुम मेरे साथ न होगे तब तक
ऐ कराची ये बता अब किस से मिलने आऊँगीकिस की बाँहों में सिमट कर चैन ओ सुख मैं पाऊँगीमाँ तिरी फ़ुर्क़त का सदमा मैं नहीं सह पाऊँगीकिस तरह यादों से तेरी अपना दिल बहलाऊँगीकल-अदम मैके का फेरा माँ तिरे जाने के बा'ददम घुटा जाता है मेरा माँ तिरे जाने के बा'द
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