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नज़्म
सगान-ए-ख़ूक ज़ाद-ए-बर्ज़न ओ बाज़ार-ए-बे-मग़्ज़ी
मिरी जानिब अब अपने थोबड़े शाहाना करते हैं
जौन एलिया
नज़्म
ख़ुशी भी चौंक चौक उठी ग़म की आँख खुल गई
अगरचे डॉक्टर ने मुझ को मौत से बचा लिया