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नज़्म
जब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदा
तो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
पस्ती-ए-ख़ाक पे कब तक तिरी बे-बाल-ओ-परी
फिर मक़ाम अपना सर-ए-अर्श-ए-बरीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
वो मेरा शेर जब मेरी ही लय में गुनगुनाती थी
मनाज़िर झूमते थे बाम-ओ-दर को वज्द आता था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हमारी धड़कनें तेरे ही बाम-ओ-दर में पिन्हाँ हैं
तिरे माहौल में हम सब के महसूसात ग़लताँ हैं
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर
अजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
लोगों की तो बातें सच्ची हैं और दिल का भी कहना करना हुआ
पर बात हमारी मानो तो या उन के बनो या अपने रहो
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
दौड़ता होगा हर इक जानिब फ़रिश्ता मौत का
सुर्ख़ होंगे ख़ून के छींटों से बाम-ओ-दर तमाम