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नज़्म
ये अगर झूट है तो मुँह से कहो, चुप क्यूँ हो
तुम ने क्या मुझ से किसी क़िस्म का वादा न किया
शकील बदायूनी
नज़्म
ज़रा सी ठेस से भी शीशा-ए-दिल टूट जाता है
बहुत नाज़ुक मगर अज़-क़िस्म इस्तिहकाम है उर्दू
माजिद-अल-बाक़री
नज़्म
तो इस चारों जानिब फैली हथियारों की दुनिया
सीना दहला देने वाले तय्यारों की इंसाँ-कुश आवाज़ें
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
इन की क़ीमत-ए-ख़रीद या क़ीमत-e-फ़रोख़्त जारी नहीं करता
हर क़िस्म के जज़्बे से आरी ये फूल
ज़ीशान साहिल
नज़्म
ख़ुदा का अर्श काँप उठता था इस फ़रियाद को सन कर
बरादर-कुश सज़ा पाते थे पत्थर बन के जीते थे
सहर अंसारी
नज़्म
कभी अपने साथ जमघटों में नफ़रत की कोई नई क़िस्म की
ज़हरीली गैस बन कर हम पर छोड़ती हैं
अज़रा अब्बास
नज़्म
इस का फिर विर्से में मिलना भी तअज्जुब-ख़ेज़ है
ख़ानदानी क़िस्म का दुख है हज़र-अंगेज़ है